कभी अन्ना के साथ साथ आंदोलन करने वाले अरविंद केज़रीवाल जब आंदोलन से अलग होकर एक राजनीतिक पार्टी बनाई तो किसे ने उन्हे इतनी गम्भीरता से नही लिया कारण था आंदोलन मे जुटी टीम अन्ना का दो हिस्सो बंट जाना । जिसमे एक हिस्सा मे खुद अन्ना थे जिनका मानना था कि राजनीति एक दलदल है जिसमे हम फंसना नही चाह्ते हम दूर से ही आंदोलन करेंगे तथा व्यव्स्था को बदलेंगे । और दूसरा हिस्सा अरविंद केज़रीवाल का था जिसका मानना था कि राजनीति मे दूर रहकर राजनीति को नही बदल सकते हैं और राजनीति अगर दलदल है तो हम इस दलदल मे घुस कर ही इसे साफ करेंगे और इसे के साथ एक राजनीतिक पार्टी बना ली और नाम रखा आम आदमी पार्टी । जैसा की नाम से ही लगता है की अरविंद ने आरम्भ से ही आम आदमी को केंद्र मे रखा । और आम आदमी से जुडे मुद्दो को केंद्र मे रखा और देल्ली विधान सभा मे 28 सीटे लेकर आई । लेकिन इसमे अगर जो सबसे अलग था वो आम आदमी पार्टी का रवैया जैसा की आम आदमी पार्टी एक आंदोलन की उपज थी उसने कुछ ऐसा महौल बनाया कि सभी राजनीतिक दलो की नींद हराम हो गयी । किसी को ये समझ मे नही आ रहा है कि कैसा ये राजनीति है न ही ये धर्म की बात कर रहा है न ही यह कि जाति की बात कर रहा है फिर भी इसको इतना समर्थन कैसे मिल रहा है क्यो लोग आम आद्मी पार्टी के साथ है । भला बिजली पानी भी कोई मुद्दा है बिजली पानी पर तो सभी पार्टी लड्ते रहती है फिर ये अरविंद केज़रीवाल ने ऐसा क्या कमाल कर दिया । लेकिन शायद ये राजनीतिक दल ये भूल चुके है की अब जनता आपके राजनीती से ऊब चुके है और वर्तमान व्य्वस्था से पूरे तरीके से नाराज़ है । लोग अब जानने लगे है के मुद्दा बस एक चुनावी छलावा है बाकी चुनाव खत्म होते ही सबके चाल एक जैसे ही हो जाते है । अब राजनीती से सेवा शब्द क कोई मतलब नही रहा । खासकर 1991 के बाद जो (निजीकरन का दौर ) विकास की अंधी दौड हुई जिसमे आज आम आदमी बहुत पीछे हो गया है जहा कभी कुर्सी सेवा की निशानी हुआ करती थी वो बस नोट छापने की मशीन बन कर रह गयी राजनीति एक व्य्व्साय हो गया जिसमे लोग चुनाव मे पैसा निवेश कर पांच साल मे हजार गुना तक बनाने लगे और इसमे एक से एक अपराधी शरण लेने लगे पूंजीपती मुनाफे के चक्कर मे चुनाव मे पैसा लगाने लगे पूरी व्य्वस्था पैसे का गूलाम हो नतीजा यह निकला की जन्म प्रमाण पत्र से म्रुत्यु प्रमाण पत्र बनाने के लिये भी पैसा लिया जाने लगा । और यह एक ट्रेंड बन गया नेता पैसा कमाने मे इतना व्यस्त हुआ कि आम आदमी से बिल्कुल दूर हो गया । एक से एक घोटाले सामने आने लगे मह्गाई आसमान छूने लगी और आम आदमी का गुस्सा ज्वार बन कर फूटा और आंदोलन होने लगे । आज आम आदमी पार्टी का बनना उसी गुस्से का ही नतीज़ा है । और इसमे अरविंद केज़रीवाल की सबसे खास बात यह रही की इन्होने उसी को मुद्दा बनाया जिसको लेकर आम आदमी पीडित था । और जो वी आई पी कलचर को खतम करने की बात थी वो सबसे मुख्य था । आज अरविंद केज़रीवाल ने सभी राजनीतिक दलो को पुनर्विचार करने को मज़बूर कर दिया है और सालो से चल रही राजनीति को सिर के बल खडा कर दिया है| ये दौर अरविंद क है आज के समय मे कोई भी राजनीतिक दल अरविंद का विरोध नही कर सकता है जो भी विरोध करेगा उसे नुकसान के अलावा कुछ हासिल नही होगा । लेकिन अरविंद को अगर लम्बी राजनीति करनी है तो इस भ्रस्टाचार के पूरे तंत्र को शुरु से समझना होगा जहा पहले तो निजि और दल के स्वार्थ मे फंसकर सरकारी पैसे का दुरुपयोग किया जाता है फिर कोस के खाली होने के नाम से एक तरफ जहा टैक्स बढा दिया जाता है जिससे मह्गाई बढ्ती है वही दूसरी तरफ सार्वजनिक सम्पत्तियो की नीलामी का नंगा नाच किया जाता है जिसमे फिर से सरकारी कोस को नजरांदाज किया जाता है और फिर से अपने फायदे के लिये औने पौने दाम पर बेच दिया जाता है और फिर ये सरकारी कोस के घाटे का नाटक करने लगते है ज्यादा हुआ तो एक जांच समिति बनाते है जिसमे फिर से सरकारी पैसे बडी मात्रा मे खर्च होता है और बाद मे उसके रिपोर्ट को खारिज़ कर दिया जाता है अगर दबाव पडा तो मुकदमा दर्ज हो जाता है जिसमे उम्र भर केस चलता है और फैसला होने से पहले ही नेता स्वर्ग पहुच जाता है । इस सारे खेल मे आम आदमी केवल मूक दर्शक ही रहता है। ये बहुत सही समय है की इस पर बहस हो और सरकारी मद का दुरुपयोग करने वालो पर सख्त कार्यवाही हो । बाकी तो सब जानते ही हैं ।
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